जयपुर। ’12 साल का था जब पिताजी का देहांत हो गया, घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, इसलिए बहुत कम पढ़ पाया, लेकिन 15 साल की उम्र में रेलवे स्टेशन पर भूखे पेट सोते हुए सपने देखता था – कभी मैं भी अमेरिका जाऊंगा, मेरे पास मर्सिडीज कार होगी, हजारों लोग मेरे साथ काम कर रहे होंगे…।’ जस्ट डायल लिमिटेड के पूर्व वाइस प्रेसीडेंट तथा एंजेल इनवेस्टर राजेश डेम्बला ने जब अपना जीवन सफर बताने की शुरुआत की तो आंखें खुली की खुली रह गईं। वैसे हालात और ऐसे सपने! लेकिन आज वे सपने हकीकत ही नहीं, बल्कि उससे कहीं आगे का सफर तय कर चुके हैं। कई कंपनियों के फाउंडर तथा स्टार्टअप कंपनियों को फंडिंग करने में एक जाना-पहचाना नाम बन चुके राजेश डेम्बला ने अपने जयपुर प्रवास के दौरान एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में जीवन सफर पर खुलकर बात रखी। प्रस्तुत है प्रमुख अंश :

पहली फुल टाइम जॉब मिली ऑफिस बॉय की
डेम्बला ने बताया कि 12 साल का था जब पिताजी का देहांत हो गया, घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, इसलिए 10वीं तक ही पढ़ पाया। घर भी खाली करना पड़ा तो मां-बहन को बुआ के यहां छोड़ा। मैं काम की तलाश में निकल पड़ा। 15 साल की उम्र में तीन महीने बेंगलूरु के रेलवे स्टेशन पर रात गुजारी। अक्सर खाने को पैसे नहीं होते थे। किसी से मांगता भी नहीं था। ठंड में कई रातें भूखे पेट आंखों में आंसू लिए गुजारीं। वहां एक कुली थे इकबाल। वे मुझे खाने को पूछते तो मैं मना कर देता। लेकिन वे शक्ल देखकर समझ जाते। कई बार एक्स्ट्रा होने का बहाना बनाकर चाय और बन दे जाते। वहां कुलियों को देखते हुए सोचा करता था कि मुझे ऐसे जिंदगी नहीं गुजारनी। कुछ बड़ा करना है। सपने देखता था कि कभी मैं भी अमेरिका जाऊंगा, मेरे पास मर्सिडीज कार होगी, हजारों लोग मेरे साथ काम कर रहे होंगे। वहां अन्य कुली मेरी बातों पर हंसते थे। यह बात वर्ष 1985-86 की होगी। मेरी पहली फुल टाइम जॉब एक दुकान में ऑफिस बॉय की थी। चूंकि मैंने आगे पढऩे के लिए कॉलेज में एडमिशन के लिए सोचा था और पैसे थे नहीं। ढाई महीने का समय था। तनख्वाह पूछने पर मैंने मालिक से कहा कि आप मुझसे कोई भी काम करवा लो, बस मेरी फीस आप जमा करवा देना। मैंने ऑफिस बॉय रहते सभी काम किए। दुकान की साफ-सफाई, चाय-पानी पिलाना और साइकिल से मार्केट जाकर कलेक्शन व अन्य काम करना। ढाई महीने बाद मालिक ने पूछा कि कितनी फीस जमा करानी है। मैं पूछकर आया, 750 रुपए फीस थी। उन्होंने मुझे दे दिए और मैंने जमा करवा दिए। लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था। मां की तबीयत ज्यादा खराब हो गई। मुझे ज्यादा पैसे की जरूरत थी, तो मैंने कई काम किए। टेलरिंग, होर्स क्लिनिंग जैसे काम भी किए। मैंने 5-6 साल तक कई छोटे-मोटे काम किए। रात को भी काम करना पड़ा। मैंने होटल में स्टूअर्डस का काम भी किया। इस दौरान मैं अमीरों को देखता था, सोचता था कि ये ऐसा क्या करते हैं जो इनके पास पैसा आता है। यह समझने के लिए मैं पीछे खड़ा होकर उनकी बातें सुनता था। सौ लोगों से मिलता था तो महसूस करता था कि जीत का कोई एक फार्मूला नहीं है।

ऑफिस कैसा होता है, बस यह देखने गया था
21 साल का था तब एक दोस्त ने कहा कि एक ऑफिस में अकाउंटिंग वगैरह जॉब निकली है। उसने साथ चलने को कहा। मैंने कहा कि मुझे तो कुछ आता नहीं है, मैं चलकर क्या करूंगा। तो वो बोला, चल ऑफिस देख लेना। ऑफिस कैसा होता है, यह देखने के लिए उसके साथ चल पड़ा। वो ऑफिस था गेट इट यैलो पैजेज का। जब मैं वहां बैठा था तो फॉर्म जमा कर रही लड़की ने मेरा फॉर्म मांगा। मैंने कहा कि मैं तो साथ आया हूं, मैंने नहीं भरा। मुझे कुछ आता नहीं है। तो उस लड़की ने कहा कि तुम फॉर्म तो भरो, इंटरव्यू तक मैं पहुंचा दूंगी। हो सकता है कोई काम मिल जाए। वहां इंटरव्यू ले रहे मि. किनी ने कहा- तुम्हें सेल्समैन की नौकरी दे देते हैं। मुझे नौकरी मिलने से आश्चर्य हुआ, जब मैंने उनसे वजह पूछी तो उन्होंने कहा कि तुम जैसा लड़का दुनिया में कुछ भी कर सकता है। यह बात 1991 की है, उस समय मुझे 800 रुपए तनख्वाह पर रखा। पेट्रोल व कमीशन अलग था। मेरे डायरेक्ट बॉस अजय थे, लेकिन पता नहीं क्यों वे मेरे प्रति पॉजिटिव नहीं थे। वे बोलते थे कि तुम्हारा प्रमोशन कभी नहीं हो पाएगा। लेकिन मैंने भी सोच लिया था कि मैं सफल होकर दिखाऊंगा। मुझे गीता में लिखे पर दृढ़ विश्वास है कि कुछ भी स्थायी नहीं है। मैंने कड़ी मेहनत की। टारगेट व अन्य पैरामीटर्स पूरे किए। मुझे पूरा विश्वास था कि मेरा प्रमोशन होगा ही, लेकिन प्रमोशन की लिस्ट में मेरा नाम नहीं था। उस दिन मुझे जोर का झटका लगा। मैं बाथरूम में गया, जहां मुझे उल्टियां होने लगी। इसके बाद मैं बड़े अधिकारी के पास गया। उन्हें अपना इस्तीफा दिया, लेकिन तारीख नहीं डाली। उनसे कहा कि मुझे ऐसी कंपनी में काम नहीं करना है, जहां टेलेंट को नहीं समझा जाता हो। लेकिन मैं ऐसे ही नहीं जाऊंगा, आपको दिखाकर जाऊंगा। आप मुझे कोई टारगेट दो, मैं पूरा करके दिखाऊंगा। आप उस दिन इस इस्तीफे पर तारीख डाल लेना। उन बड़े अधिकारी ने तीन महीने का टारगेट दिया, तो मैंने कहा कि इतना समय नहीं है मेरे पास। आप एक महीने का टारगेट दो। यह बात 1992 की है। उस समय साल का टारगेट 12 लाख रुपए होता था, मतलब महीने का 1 लाख। उन्होंने एक महीने का 2 लाख का टारगेट दिया। मैंने 15 दिन में 6 लाख का बिजनेस लेकर उनके पास पहुंच गया और इस्तीफे पर तारीख डालने को कही। उन्होंने 10 मिनट अपनी जगह इंतजार करने को कहा। इतनी देर में पूरे ऑफिस स्टाफ को एक जगह इकट्ठा होने के आदेश हुए और सबके सामने मेरा प्रमोशन अनाउंस हुआ और मेरे बॉस अजय के बराबरी की पॉजिशन मुझे दे दी गई। इस घटना से मैंने सीखा कि नाइंसाफी पर बोलो, चुपचाप हार मानोगे तो हारते रहोगे। हालांकि इसके बाद भी अजय ने गलती नहीं मानी और कहा कि यहां तक तो पहुंच गए, लेकिन आगे टिक नहीं पाओगे। उसी समय मैंने चैलेंज दिया कि अगले साल मैं तुम्हारा बॉस बनकर दिखाऊंगा। मैंने अपनी टीम को टारगेट नहीं दिया, बल्कि उनसे पूछा कि तुम्हारा एक साल बाद का सपना क्या है? घर, गाड़ी वगैरह-वगैरह। मुझे आश्चर्य हुआ कि हर किसी की कोई बड़ी ख्वाहिश थी। इस पर मैंने उनसे कहा कि अब आपको टारगेट नहीं, अपने सपने पूरे करने के लिए काम करना है। अगले साल मेरी कुर्सी पर मैं आपको देखना चाहता हूं और इस तरह मेरी टीम ने जो काम किया, वो कंपनी की उम्मीदों से परे था। एक दिन उन बड़े अधिकारी ने मुझे बुलाया और कहा कि कंपनी तुम्हें प्रमोशन देना चाहती है, लेकिन दिक्कत यह है कि फिर तुम्हारे पूर्व बॉस को तुम्हारे अधीन काम करना होगा। तुम्हें भी मौका मिलेगा तो उसके साथ वैसा ही बर्ताव करोगे, जैसा उसने किया था। तब मैंने कहा, नहीं, ऐसा नहीं होगा। मैंने ह्यूमन इमोशन सीखा है सड़कों पर। खैर, मेरा प्रमोशन हुआ और मेरा पूर्व बॉस मेरे अधीन आ गया। पहली ही मीटिंग में मैंने अजय से कहा कि आज से मेरा मकसद रहेगा- तुम्हारा दिल जीतना।

मां के अंतिम संस्कार के लिए पैसे नहीं थे
मेरी बचत की आदत नहीं थी। मेरी इस कमी का अहसास मुझे मेरी मां के देहांत पर हुआ। 1995 में मां का देहांत हुआ तब मेरे पास अंतिम संस्कार के लिए पैसे नहीं थे। मैंने ऑफिस में कहलवाया। सुबह से लेकर दोपहर तक पैसे नहीं आए। आखिरकार दोपहर 3 बजे मेरा सहकर्मी बद्री पैसे लेकर आया, फिर अंतिम संस्कार हो पाया। बाद में पता चला कि उसका ऑफिस में किसी से संपर्क नहीं हो पाया, इस वजह से वह अपने पिता से पैसे मांगकर लाया था। इससे मुझे सीख मिली कि कमाई के साथ बचत भी उतनी ही जरूरी है।

टीवी पर जस्ट डायल के फाउंडर का इंटरव्यू देखकर जुड़ा
1997-98 की बात है। इंटरनेट का यहां शुरुआती दौर था। एक दिन टीवी पर जस्ट डायल के फाउंडर मणि का इंटरव्यू आ रहा था। मुझे कुछ बड़ा करने का नशा पहले से ही था। मैंने उनसे संपर्क किया कि आपके साथ काम करना है। कमीशन पर काम करने की बात फाइनल हुई। मैंने अपना ऑफिस लिया और 45 प्रतिशत कमीशन पर काम शुरू कर दिया। इस तरह जस्ट डायल से पहला जुड़ाव हुआ। कंपनी ने उस समय बेंगलुरु को दो हिस्सों में बांट दिया था। एक हिस्से का बिजनेस हम देते थे। दूसरे हिस्से का कंपनी खुद करती थी। उस समय हमारा बिजनेस कंपनी की तुलना में कहीं ज्यादा था। यह 1:6 था। इसके अलावा प्रोडक्ट की अंडर वैल्यूशन थी। जब मैंने कंपनी में इस बारे में बात की, तो उन्होंने ज्यादा लाकर दिखाओ। इस पर हमने करीब 4 गुना ज्यादा में प्रोडक्ट बेचकर दिखाया। इस पर कंपनी को भी अपने प्रोडक्ट की वैल्यू समझ में आई।

…तो 10 साल आगे होता
जस्ट डायल के साथ कमीशन पर काम करते हुए कंपनी ने साथ जुडऩे को कहा। यह मेरी जिंदगी का पहला गलत फैसला था कि मैं सैलरी पर कंपनी से जुड़ा। आज भी सोचता हूं कि यदि मेरा यह फैसला दूसरा होता तो आज मैं जहां हूं, वहां 10 साल पहले ही हो जाता। खैर, जस्ट डायल के साथ काम करने के दौरान मुझे ऑफर मिला कि मैं इंटरनेट पर यैलो पैजेज शुरू करने वाला पहला भारतीय बनूं। मैंने Indya. com ज्वाइन किया और अपने बेहतरीन दिन इंटरनेट पर यैलो पेजेज शुरू करने में बिताए। इस बीच जस्ट डायल भी दूसरे हाथों में चली गई थी। वर्ष 2001 सभी डॉट कॉम कंपनियों के लिए बुरा समय साबित हुआ। इंटरनेट की पहुंच अधिक ना होने के कारण कंपनियां बंद हो गईं। हमारा भी कामकाज बंद हो गया। इस दौरान मणि ने फिर से जस्ट डायल अपने अधिकार में लिया और मुझे बुलाया। हमने फिर से काम शुरू किया। इस बार यैलो पेजेज निकालने का प्लान बना। वर्ष 2004 में जस्ट डायल यैलो पेजेज पहली बार आर्ट पेपर पर हमने इंडिया में लॉन्च किया। जबकि इस दौर में टाटा और गेट इट जैसे बड़े प्लेयर पहले से मौजूद थे। इसके बावजूद हमने अपने इन कॉम्पिटिटर्स को रेवेन्यू में भी पीछे छोड़ दिया। 2004 से 2007 तक 13 शहरों में हमने जस्ट डायल यैलो पेजेज को लॉन्च किया।

काम करवाने वालों का होना चाहिए बड़ा दिल
जस्ट डायल की सफलता के साथ इसमें निवेश करने वाले भी बढऩे लगे। वर्ष 2009 में मुझे भी लगा कि सैलरी की जगह मुझे इसमें शेयर लेने चाहिए, लेकिन यह संभव नहीं हो सका। तब आईपीओ की बातें चल रही थीं। मेरा मानना है कि काम करवाने वालों का दिल बड़ा होना चाहिए। आखिरकार 2013 में आईपीओ आया।

कहते हैं 100 में से 90 स्टार्टअप होते फेल, मेरे साथ उल्टा
वर्ष 2011 में जब स्टार्टअप कोई नहीं समझता था, मैंने उनमें निवेश करना शुरू किया। कहा जाता है कि 100 में से 90 स्टार्टअप फेल हो जाते हैं, लेकिन मेरे साथ उल्टा है। अब इसे किस्मत कहें या कुछ और। मैंने मेरी समझ से जितने स्टार्टअप में निवेश किया, 90 प्रतिशत से ज्यादा ने अच्छा परफॉर्म किया और कर रहे हैं। एक स्टार्टअप से तो 500 गुना रिटर्न मिला।

2 साल के अंदर 100 करोड़ के टर्नओवर पर पहुंच गई ‘पेसिफिक गेमिंग’
डेम्बला द्वारा प्रमोटेड स्टार्टअप कंपनी ‘पेसिफिक गेमिंग’ बिना किसी बाहरी निवेश के मात्र 2 साल के अंदर 100 करोड़ के टर्नओवर पर पहुंच गई। डेम्बला ने चार साल पुराने स्टार्टअप मॉबटेक्सिटिंग में 2017 में निवेश किया था, तब कंपनी का टर्नओवर 2.2 करोड़ था। एक ही साल में यह बढ़कर 15 करोड़ के टर्नओवर पर आ गई।

ऐसे स्टार्टअप जिनमें गूगल और इंफोसिस के फाउंडर्स ने भी निवेश किया
डेम्बला ने वर्ष 2016 में डनजो में इनवेस्ट किया, जिसमें बाद में गूगल ने भी रुचि दिखाई और कई बड़े वेंचर कैपिलिस्ट के साथ वर्ष 2018 में निवेश किया। इनमें मेक मॉय ट्रिप के फाउंडर दीप कालरा भी शामिल हैं। इसी तरह सर्वेडर में भी शुरुआती इनवेस्टमेंट किया, जिसमें इंफोसिस के फाउंडर्स क्रिस गोपालकृष्णन व शुबुलाल का भी निवेश है। आज इस कंपनी के दुनियाभर में कस्टमर हैं।

युवाओं में गजब की प्रतिभा है, लेकिन पेरेंट्स डराते हैं
डेम्बला कहते हैं कि यह सुनने में तीखा लगेगा, लेकिन यह सच है कि हमारे पेरेंट्स ही हमें डराते हैं। हर पेरेंट अपने बच्चे का करियर सिक्योर देखना चाहता है। चाहे उनके बच्चे में गजब की प्रतिभा है और वह नया कुछ करने को कदम बढ़ाना चाहता है, लेकिन पेरेंट्स सिक्योर जॉब को प्रिफर करते हैं। आप देखें, बचपन से ही बच्चे को हर चीज पर टोकना, जैसे कि उसे कुछ आता ही नहीं। यह प्रवृत्ति हमें छोडऩी होगी। बच्चों को रिस्क लेकर आगे बढऩे के लिए प्रेरित करना होगा। यह दौर सबसे अच्छा है जब ऐसी टैक्नोलॉजी व अन्य सुविधाएं मौजूद है जो किसी भी स्टार्टअप को आगे बढ़ाने में पूरी तरह सक्षम है।

  • संजीव माथुर

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