– अंकुर गुप्ता (सिंगापुर) –

समझता है तो फिर सम्भलता क्यूँ नहीं
उड़ने में ख़तरा है तो चलता क्यूँ नहीं
मर्ज़ी की राह नहीं तो राह की मर्ज़ी सही
मंज़िलें कई हैं घर से निकलता क्यूँ नहीं

मैं परवाना हूँ मैंने जल के दिखा दिया
तेरा दिल मोम है तो पिघलता क्यूँ नहीं

जो मेरे इख़्तियार में था सब बदल दिया
अब तेरी बारी है मुक़द्दर बदलता क्यूँ नहीं

शाम का लिहाज़ ना चिराग़ों की शरम
ये कैसा सूरज है अब ढलता क्यूँ नहीं

यतीमखाने में खेलते बच्चे सा दिल है
बहल तो जाता है पर मचलता क्यूँ नहीं

उम्मीद नहीं रही तो याद भी ना आए
जो सुलगता है अंदर वो जलता क्यूँ नहीं

क्या कमी रही आरज़ू की परवरिश में
ख़्वाब इक आँखों में पलता क्यूँ नहीं

By Admin