– सुनीता पाहूजा (मारीशस) –

मैंने देखी है इक हकीकत
खुद को उड़ते हुए देखा है मैंने
परों के साथ नहीं, बिना परों के
खुद को उड़ते हुए देखा है मैंने।

आप हैरान न हों सुनकर
यह मेरा ही ख़्वाब था उड़ने का
या सनक थी, या धुन थी
या महज़ ज़िद ही थी………..उड़ना है
बस उड़ना है……………यही ज़िद थी।

कुछ मेरे साथ थे इस ज़िद में
करते मेरी हौसला अफ़्ज़ाई
कुछ रहनुमा भी थे
ख़ुदा के बंदे खूबसूरत।
कुछ हैरान परेशान लोग भी थे
जो डरते भी थे, डराते कभी,
कभी हँसते मुझपर, कि……
कैसे हो सकती है ये ज़िद पूरी!

मगर मुझे यकीं था, कि
हकीकत की ज़मीं पर पाँव रखने से पहले
किसी बहुत ऊँची मंज़िल को
पाने से भी बहुत पहले
ज़रूरी था बहुत ज़रूरी
कि पहला कदम रखा जाए
पहला कदम रखा जाए
ख़्वाबों की दुनिया में।

मैंने ख़्वाब देखा था…………
…….खुली आँखों से,
और इसी से, मुझे पूरा यकीं था
कि ख़्वाबों कि दुनिया में
मेरे पहले कदम के नीचे ही
ठोस ज़मीं थी मेरी मंज़िल की।

मेरा पहला कदम ही था मेरा रास्ता,
हाँ सच! मेरे पहले कदम ने ही दी
मुझे मेरी मंज़िल………………
…………….मेरे उड़ने की हकीकत!

 

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