Menu Close

विकास और भुखमरी को लेकर आई रिपोर्ट्स बेहद चौंकाने वाली और चिंताजनक

भारत का सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी आकार के हिसाब से लगभग 2.6 ट्रिलियन डॉलर यानी लगभग156 लाख करोड़ रुपए है। ऑक्सफेम की मानें तो भारत में साल 2000 में ऊपर के एक प्रतिशत लोगों  के पास देश की 37 प्रतिशत दौलत होती थी, जो 2005 में बढ़ कर 42 प्रतिशत, 2010 में 48 प्रतिशत, 2012 में 52 प्रतिशत, उसके बाद 65 प्रतिशत हो गई। पिछले साल यह आंकड़ा 73 प्रतिशत तक जा पहुंचा। अमीरों के बढ़ने की अगर यही रफ्तार रही तो साल 2022 तक देश में खरबपतियों की संख्या दोगुनी हो जाएगी।  चूंकि प्रति व्यक्ति आय, सकल राष्ट्रीय आय को आबादी से भाग देकर निकाली जाती है यानी ऊपर के एक प्रतिशत और नीचे के 99 प्रतिशत की आय बराबर समझ ली जाती हैं, जिससे विकास सूचकांक चढ़ता दिखता है, पर हकीकत कुछ और होती है।

दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाले देश भारत के लिए 30 दिनों के भीतर ही विकास और भुखमरी को लेकर आई दो रिपोर्टें बेहद चौंकाने वाली और चिंताजनक हैं। ये रिपोर्टें बताती हैं कि तरक्की के तमाम दावों के बीच समूचे देश के विकास और आम लोगों के जीवन-स्तर में सुधार के स्तर पर हम कितना पिछड़ रहे हैं। साल 2018 के लिए जारी ग्लोबल हंगर इंडेक्स के 119 देशों की सूची में भारत 103वें स्थान पर हैं। इससे पहले संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम द्वारा जारी मानव विकास सूचकांक के 189 देशों की सूची में हम 130वें नंबर पर थे। खास बात यह कि ऐसा उस प्रजातांत्रिक देश में हो रहा, जहां सरकारें जनहित के दावों पर ही खुद जनता द्वारा चुनी जाती रही हैं।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत के खराब प्रदर्शन को इससे भी समझ सकते हैं कि नेपाल और बांग्लादेश जैसे जिन पड़ोसी देशों को अरबों की सहायता देकर हम अपने को एशिया के सबल व ताकतवर देशों में गिनते हैं, हमारे नागरिकों का जीवनस्तर उनसे भी बेहद खराब है। चीन को तो भूल ही जाइए, वह भारत से इतना आगे है, जिसे हाल के सालों में विकास की दिशा व रफ्तार को बदले बिना छूना भी नामुमकिन है। चीन 25वें नंबर पर है। पाकिस्तान को छोड़कर, जिसका स्थान 106वां है, हमारे सभी पड़ोसी मुल्क हमसे बेहतर स्थिति में हैं।  इस सूची में बांग्लादेश 86वें, नेपाल 72वें, श्रीलंका 67वें और म्यामांर 68वें स्थान पर हैं।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स को ‘जीएचआई’ भी कहते हैं। यह वैश्विक, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर भुखमरी का आंकलन करता है। हर साल अपनी गणना में जीएचआई भूख से लड़ने में हुई प्रगति और समस्याओं का लेखाजोखा भी शामिल करता है। साल 2006 में इंटरनेशनल  फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट ने ग्लोबल हंगर इंडेक्स की शुरुआत की थी और वेल्ट हंगरलाइफ नामक जर्मन संस्था ने उसी साल पहली बार ग्लोबल हंगर इंडेक्स जारी किया था। भुखमरी को आंकने के मामले में यह दुनिया की सर्वाधिक विश्वसनीय एजेंसी है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स में दुनिया के तमाम देशों में खानपान की स्थिति का विस्तृत ब्योरा भी शामिल किया जाता है। मसलन, लोगों को किस तरह का खाद्य पदार्थ मिल रहा है, उसकी गुणवत्ता और मात्रा कितनी है और उसमें कमियां क्या थीं। पूरे साल के आंकड़ों के साथ हर साल अक्टूबर में यह रिपोर्ट जारी की जाती है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स के निर्माता यह भी देखते हैं कि देश की कितनी जनसंख्या को पर्याप्त मात्रा में भोजन नहीं मिल रहा है।

यानी किसी भी देश के कितने लोग कुपोषण के शिकार हैं। इसमें यह भी देखा जाता है कि पांच साल के नीचे के कितने बच्चों की लंबाई और वजन उनके उम्र के हिसाब से कम है। इसके साथ ही इसमें बाल मृत्यु दर की गणना को भी शामिल किया जाता है। खास बात यह कि साल 2014 में भारत जहां 55वें स्थान पर था, वहीं साल 2015 में सीधे 80वें स्थान पर जा पहुंचा। अगले ही साल 2016 में 97वें और साल 2017 में 100वें पायदान पर पहुंच गया।

अब इसी परिप्रेक्ष्य में अगर हम संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम द्वारा जारी मानव विकास सूचकांक यानी एचडीआई के आंकड़े को भी देखें, तो यहां भी हम दुनिया के 189 देशों की सूची में 130वें पायदान पर हैं। पिछले 27 सालों में जब दूसरे देश विकास की दौड़ में तेजी से आगे भागते रहे तब हम 135 से 131 के बीच लटके रहे। इसमें प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय द्वारा मापा गया जीवन स्तर, जन्म में जीवन प्रत्याशा द्वारा मापा जाने वाला स्वास्थ्य और वयस्क आबादी और बच्चों के लिए स्कूली शिक्षा के अपेक्षित वर्षों के बीच शिक्षा के औसत वर्षों की गणना भी की जाती है। खास बात यह कि बाजार के प्रभाव में दुनिया की ज्यादातर सरकारें जीडीपी पर फोकस तो करती हैं, पर मानव विकास को लेकर उदासीन रहती हैं।  इससे असमानता तो बढ़ती ही है, तरक्की के आंकड़ों में भी हम काफी पीछे हो जाते हैं। इस साल के शुरूआत में आई विश्व सम्पन्नता रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया में छठे नंबर पर हैं और अरबपतियों की संख्या के हिसाब से अमेरिका और चीन के बाद तीसरे नंबर पर। यही नहीं, पिछले 5 सालों में भारतीयों के विदेश जाने का खर्च भी 253 गुना बढ़ा है।

भारत का सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी आकार के हिसाब से लगभग 2.6 ट्रिलियन डॉलर यानी लगभग 156 लाख करोड़ रुपए है। ऑक्सफेम की मानें तो भारत में साल 2000 में ऊपर के एक प्रतिशत लोगों के पास देश की 37 प्रतिशत दौलत होती थी, जो 2005 में बढ़ कर 42 प्रतिशत, 2010 में 48 प्रतिशत, 2012 में 52 प्रतिशत, उसके बाद 65 प्रतिशत हो गई। पिछले साल यह आंकड़ा 73 प्रतिशत तक जा पहुंचा। अमीरों के बढ़ने की अगर यही रफ्तार रही तो साल 2022 तक देश में खरबपतियों की संख्या दोगुनी हो जाएगी। चूंकि प्रति व्यक्ति आय, सकल राष्ट्रीय आय को आबादी से भाग देकर निकाली जाती है यानी ऊपर के एक प्रतिशत और नीचे के 99 प्रतिशत की आय बराबर समझ ली जाती हैं, जिससे विकास सूचकांक चढ़ता दिखता है, पर हकीकत कुछ और होती है।

खास बात यह कि मानव विकास सूचकांक के आंकड़ों और देशों की प्रगति के बीच तालमेल न दिखने से संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने साल 2010 से असमानता-समायोजित मानव विकास सूचकांक शुरू किया। जिसमें आर्थिक, शैक्षणिक व अवसर-संबंधी असमानता को शामिल किया गया। भारत इस असमानता-समायोजित विकास सूचकांक में इस साल 26.9 प्रतिशत और नीचे गिर गया, जबकि वैश्विक स्तर पर यह गिरावट मात्र 20 प्रतिशत हुई है। खास बात यह भी कि जब भी कभी वैश्विक रिपोर्टें किसी देश की ऐसी शर्मनाक तस्वीरें पेश करती हैं, तो एक ही दलील दी जाती है कि ये गैर-भरोसेमंद आंकड़ों पर आधारित है, पर हकीकत यही है कि कुल जमा तरक्की में गिरावट साफ-साफ दिखती है। ये रिपोर्टें मानव विकास के बुनियादी आयामों की खामियों और असंख्य लोगों की तकलीफदेह हालत को बयान करती हैं। हमें समझना होगा कि सामाजिक, आर्थिक, नीति और विधायी स्तर पर काफी प्रगति होने के बाद भी क्यों देश का एक बड़ा तबका बेहद कमजोर है। उन्हें एक बेहतर जिंदगी दिलाने की जिम्मेदारी हमारे नीति-नियामकों की ही है।

  • जयप्रकाश पाण्डेय 

Leave a Reply

%d bloggers like this: