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महिलाओं के प्रति संवेदना का घोर अभाव

केंद्र सरकार ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से जुड़े मामलों को लेकर एक मंत्री समूह (जीओएम) का गठन किया है। यह मंत्री समूह सेक्सुअल हैरसमेंट के खिलाफ बने मौजूदा प्रावधानों को अमल में लाने के लिए जरूरी कदम उठाएगा, साथ ही वर्तमान कानूनी व संस्थागत ढांचों को और बेहतर व मजबूत बनाने के लिए सुझाव देगा। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह इसके अध्यक्ष होंगे। बाकी तीन सदस्य हैं- नितिन गडकरी, निर्मला सीतारमन और मेनका गांधी। यह जीओएम #मीटू आंदोलन से बने दबाव की देन है। सोशल मीडिया से उठे इस आंदोलन ने कार्यस्थल पर यौन शोषण की समस्या को प्रभावी ढंग से उठाया और इसकी आंच केंद्र सरकार पर भी पड़ी। पूर्व विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर को खुद पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों के दबाव में इस्तीफा देना पड़ा। अब यह समिति गठित कर सरकार ने जताया है कि वह महिलाओं के जीवन और सम्मान से जुड़े मसलों से आंखें नहीं फेर सकती, जोकि निश्चय ही एक स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन इस कदम की सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब यह मंत्री समूह तत्काल सक्रिय होकर कोई उल्लेखनीय पहलकदमी ले। निर्भया कांड के बाद कई तरह के ढांचे बनाने की बात कही गई, जिनमें कुछ ही बने और वे भी निरर्थक सिद्ध हुए।

उम्मीद करें कि जीओएम क्षरण की इस प्रक्रिया को रोकेगा। कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकने के लिए सरकारी प्रावधानों की कोई कमी नहीं है। 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में कई दिशा-निर्देश जारी किए, जिन्हें विशाखा गाइडलाइंस कहते हैं। इसके तहत नियोक्ताओं के लिए कार्यस्थल पर एक शिकायत समिति का गठन जरूरी बनाया गया और उन्हें महिलाओं के लिए अनुकूल माहौल बनाने के निर्देश दिए गए। इन गाइडलाइंस के प्रावधानों को ‘कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013’ में और व्यापक रूप मिला। इसके तहत 10 से अधिक कर्मचारियों वाले सभी कार्यालयों में शिकायतों के निपटारे के लिए एक समिति का गठन अनिवार्य बनाया गया।

कहा गया कि शिकायत समितियों को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामलों को 90 दिनों के अंदर हल करना होगा अन्यथा जुर्माना लगाया जाएगा। कार्यालय का पंजीकरण या लाइसेंस भी रद्द हो सकता है। इस तरह के कई और अहम प्रावधान इसमें हैं लेकिन कई कंपनियों में ऐसी समितियां हैं ही नहीं और कई में बस कागजों की शोभा बढ़ा रही हैं। शिकायत आती है तो पीड़िता को चुप करा दिया जाता है या समझौता करने के लिए कहा जाता है। दरअसल हमारा पूरा सिस्टम ही पुरुषवादी है और उसमें महिलाओं के प्रति संवेदना का घोर अभाव है। अभी महिलाओं के लिए पहले से बनी व्यवस्थाओं को ही सख्ती से लागू करा दिया जाए तो भी माहौल बदलना शुरू जाएगा।

  • एस. कुमार

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