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लड़कियों के सुरक्षित सफर के लिए खुद की जमापूंजी से खरीदकर दी 19 लाख की बस

जयपुर। दो साल पहले शिशुरोग विशेषज्ञ डॉ. रामेश्वर प्रसाद यादव अपने गांव चुरि जा रहे थे, जब उन्होंने रास्ते में बारिश में भीगती 4 लड़कियों को सड़क किनारे देखा। उनकी पत्नी तारावती ने उन लड़कियों को लिफ्ट ऑफर की। उनसे बातचीत में पता चला कि लड़कियां अपने कॉलेज गई थीं जो 18 किमी दूर कोटपूतली में स्थित है लेकिन फिर भी उनकी उपस्थिति बेहद कम है। इसकी वजह इलाके में अक्सर होने वाली तेज बारिश नहीं, बल्कि लड़कियों को इलाके के पथरीले, गर्म और धूलभरे रास्ते पर 3 से 6 किमी तक पैदल चलना होता है, तब जाकर वह पब्लिक बस स्टॉप पहुंच पाती हैं, जहां से उन्हें कोटपूतली जाने वाली बस मिलती है। एक छात्रा ने उन्हें बताया, ‘बस में लड़के अक्सर हमसे बुरा व्यवहार करते हैं।’ उनकी कहानी दंपती के दिल को छू गई। रामेश्वर प्रसाद बताते हैं, ‘जब हम घर पहुंचे तो मेरी पत्नी ने पूछा कि हम कुछ कर सकते हैं क्या? इसके बाद उन्होंने दूसरा सवाल किया कि अगर हमारी बेटी आज जिंदा होती तो उसकी पढ़ाई और शादी में हम कितना खर्च करते, करीब 20 लाख रुपये?’ डॉ. रामेश्वर बताते हैं, ‘और इस तरह हमने उनके लिए एक बस खरीदने का फैसला किया।’ रिटायर्ड सरकारी डॉक्टर रामेश्वर ने अपने सामान्य पीएफ से 17 लाख रुपये निकाले जो कि कुल पीएफ सेविंग का 75 फीसदी था। उन्होंने अपनी सेविंग से इसमें 2 लाख रुपये जोड़कर 19 लाख रुपये की एक सफेद टाटा स्टारबस खरीदी। यह बस जयपुर जिले के चुरि, पावला, कायमपुरा बास और बनेती गांवों की लड़कियों को कॉलेज तक पिक और ड्रॉप करती है। रामेश्वर ने उन चारों छात्राओं को 2016 में इसके उद्घाटन के लिए आमंत्रित किया था। तारावती बताती हैं, ‘हमारी बेटी की मौत के बाद हम कुछ सोचने समझने की स्थिति में नहीं थे लेकिन अब ऐसा लगता है कि सब कुछ पूरा हो गया।’ दंपती की शादी काफी कम उम्र में हो गई थी और जब तारा 18 साल की हुईं तो उन्होंने एक बेटी हेमलता को जन्म दिया। 1976 में रामेश्वर मेडिकल एंट्रेस टेस्ट की तैयारी कर रहे थे जब उनकी बेटी को तेज बुखार हो गया। वह बताते हैं, ‘मेरी पत्नी उसे एक डॉक्टर के पास ले गई जिसने बेटी को एक इजेंक्शन दिया।’ वह उस खौफनाक पल को याद करते हुए बताते हैं, ‘उसका शरीर नीला पड़ गया था और जल्द ही उसकी मौत हो गई।’ इस सदमे से उबरने के लिए दोनों पति-पत्नी को काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। वह कहते हैं, ‘हम एक बेटी चाहते हैं लेकिन उसके बाद हमें 3 बेटे हुए। लेकिन अब महसूस होता कि मेरे पास 50 हेमलता हो गई हैं।’

निशुल्क बेटी वाहिनी सेवा की वजह से अब क्लास में लड़कियों की संख्या में इजाफा हुआ है। एक छात्रा बताती हैं कि वह अब रोज 40 रुपये और 1 घंटे का समय बचाती हैं। वह कहती हैं, ‘मेरी उपस्थिति भी दोगुनी हो गई है।’ एक अभिभावक कहते हैं कि अब उन्हें इस बात कि फिक्र नहीं होती कि उनकी तीनों बेटियां कॉलेज से घर कैसे पहुंचेंगी।  40 सीटों वाली यह बस लड़कियों के लिए वरदान है जिन्हें रोज-रोज छेड़खानी झेलने की वजह से पब्लिक बस से कॉलेज जाना पसंद नहीं था। उनकी रोज की असुविधाजनक यात्रा से उनकी अटेंडेंस में असर पड़ता था। इस इलाके में जहां पैरंट्स अपनी बच्चियों की सुरक्षा के लिए चिंतित रहते हैं वहां एक बस ड्राइवर को चुनना भी बेहद सावधानी भरा काम था। ड्राइवर की नौकरी के लिए रामेश्वर के पास पड़ोसी गांवों के 4 ड्राइवरों ने आवेदन किया। उन्होंने बस सर्विस के लिए रजिस्टर करने वाले 37 लड़कियों के अभिवावकों से चारों में से किसी एक ड्राइवर को चुनने को कहा। उनमें से लगभग 34 ने लक्ष्मण सिंह का नाम लिया। अब यह संख्या 62 हो गई है। ड्राइवर को सचेत किया गया है कि किसी भी पुरुष को बस में चढ़ने न दिया जाए। रामेश्वर कहते हैं, ‘मैं भी बस में नहीं चढ़ता। एक बार तो लड़कियों को घर छोड़ते वक्त ड्राइवर ने मुझे भी सड़क पर नजरअंदाज किया। मैंने खुश होकर उसे 100 रुपये का इनाम दिया।’ पिछले साल जुलाई में सरकारी सेवा से रिटायर होने के बाद डॉक्टर नीम का थाना से करीब 50 किमी दूर एक प्राइवेट क्लीनिक चलाते हैं। हालांकि वह रोड टैक्स देने पर दुखी नजर आते हैं। वह कहते हैं, ‘मैं हर महीने ड्राइवर, कंडक्टर सहित डीजल के लिए 36 हजार रुपये खर्च करता हूं। अथॉरिटी ने टोल माफ कर दिया था लेकिन फिर भी मुझे 5 हजार रुपये हर महीने रोड टैक्स देना पड़ता है।’ वह कहते हैं, ‘मैंने अथॉरिटी को टैक्स माफ करने के लिए पत्र लिखा है लेकिन यह बेकार गया।’ हालांकि वह कहते हैं, ‘मैं चाहता हूं कि यह बस दूसरों को कुछ सकारात्मक करने के लिए प्रेरित करे।’

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