जयपुर। हर बच्चे में कोई ना कोई प्रतिभा ईश्वर अवश्य देकर भेजता है। जरूरत होती है उसको पहचानने और निखारने की। संपन्न वर्ग में यह आसानी से हो जाता है, लेकिन वंचित वर्ग में यह सपने जैसा ही है। यदि ऐसे वंचित वर्ग के बालकों को सम्बल मिल जाए तो वे भी अपनी प्रतिभा को निखारकर उज्जवल भविष्य बना सकते हैं। कुछ इसी सोच के साथ कार्य कर रही है ‘बाल सम्बल’ संस्था। जयपुर से करीब 50 किमी दूर आमेर तहसील के सिरोही गाँव में सुरम्य पहाडिय़ों के बीच 18 बीघा क्षेत्र में स्थित यह एक ऐसी संस्था है, जो निराश्रित बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए प्रतिबद्ध है। संस्था की ओर से ऐसे बच्चों के लिए आवास, भोजन और शिक्षा की व्यवस्था तो की ही जा रही है, साथ ही उन्हें खेलकूद, संगीत, आर्ट व क्रॉफ्ट और रोजगारपरक प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। वर्ष 2008 में संस्था की स्थापना के वक्त ही यह तय कर लिया गया था कि संस्था सिर्फ निराश्रित बच्चों को छत और उदरपूर्ति का साधन उपलब्ध करवाकर अपने कर्तव्यों की पूर्ति नहीं करेगी, बल्कि बच्चों को शिक्षा और विकास के समुचित अवसर भी उपलब्ध करवाएगी। गत करीब 13 वर्ष से बाल सम्बल संस्था निराश्रित बच्चों के सपने साकार करने में जुटी है। पिछले 10 साल से आवासीय स्कूल भी चल रहा है। जो फिलहाल 8वीं कक्षा तक मान्यता प्राप्त है। अभी लगभग 60 बच्चे बाल सम्बल में उज्जवल भविष्य के लिए तैयार हो रहे हैं। यहाँ कई अध्ययन कक्षों के साथ ही कंप्यूटर कक्ष, संगीत कक्ष, खेलकूद कक्ष, पुस्तकालय और आर्ट क्राफ्ट कक्ष भी हैं। जिनसे सैकड़ों बच्चे लाभान्वित हो चुके हैं। केवल शिक्षा में ही नहीं, खेलकूद में भी अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं।

आत्मनिर्भर बनने की दिशा
18 बीघा में फैले बाल सम्बल में बच्चों के लिए रहने-पढऩे के लिए सिर्फ इमारत ही नहीं, खेल के मैदान भी हैं, दौड़ के लिए ट्रैक है, फल-फूल के पेड़-पौधे हैं। बच्चों के लिए सब्जियां भी खुद उगाते हैं। गौशाला भी बनाई है, जिससे बच्चों को दूध-दही की उपलब्धता सुनिश्चित रहे। बाल सम्बल का यह भी उद्देश्य है कि बच्चे पर्यावरण से प्रेम करना सीखें और आधुनिक तकनीक से कृषि भी सीखें। इसके अलावा लकड़ी और सिलाई का काम भी बच्चों को सिखाया जाता है, जिससे स्वरोजगार के द्वार भी खुल सकें। जिस बच्चे में जैसी प्रतिभा और रुझान नजर आता है, संस्था उसी दिशा में उसे पारंगत करने में जुट जाती है। प्रतिदिन अपनी कक्षाओं के बाद बच्चे थोड़ा आराम करके अपनी रुचि के अनुसार रचनात्मक कार्य करते हैं। कोई अखबारी कागज से कलात्मक पेन स्टैंड, वॉल हैंगिंग बनाता है तो कोई मिट्टी के दीयों व अन्य वस्तुओं पर अपनी क्रिएटिविटी उकेरता है। यहां तक कि बड़े बच्चे तो लकड़ी के काम में इतने पारंगत हो गए हैं कि कुर्सी-टेबल तक बना लेते हैं। लकड़ी का काम सिखाने के लिए एक अलग वर्कशॉप संस्था में तैयार हो रही है। बाल सम्बल में एक संगीत कक्ष भी है, जहां तबला, हारमोनियम, गिटार आदि के प्रशिक्षण के साथ ही बच्चों को नृत्य व गायन में भी पारंगत किया जाता है। दूरदर्शी सोच लेकर चल रहे बाल सम्बल में एक इनडोर स्टेडियम भी निर्माणाधीन है। यहां के बच्चे भी नेशनल-इंटरनेशनल खेलें, ऐसा लक्ष्य लेकर संस्था कार्य कर रही है। बाल सम्बल संस्था के बच्चों ने तीरंदाजी में विशेष प्रदर्शन किया है। तीरंदाजी में जगदीश कुमार व कृष्ण कुमार ने राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता जीतकर संस्था के दूसरे बच्चों के सामने एक उदाहरण पेश किया है। इस सफलता ने बच्चों का मनोबल बढ़ाया है। उनके इस बढ़ते मनोबल को सही दिशा देने में एक पूरी टीम जुटी है। चार-पांच शिक्षक संस्था में रहकर बच्चों की शिक्षा पर पूरा ध्यान देते हैं। खेलकूद, योग और संगीत के साथ ही सिलाई में भी बच्चों को पारंगत करने के लिए विषय-विशेषज्ञ नियुक्त हैं। प्रांगण में समुचित व्यवस्था बनाए रखने के लिए भोजनशाला कर्मचारी और सफाई कर्मचारी भी हैं। इस पूरी टीम के सामूहिक प्रयास से बच्चों की बेहतरी में निरंतर नए प्रयोग भी हो रहे हैं।

प्रकृति से जुड़ाव
आज मनुष्य प्रकृति से दूर होता जा रहा है तो यह जरूरी हो गया है कि बच्चों को प्रकृति का महत्व भी समझाया जाए। बाल सम्बल में बच्चे पढ़ाई के साथ-साथ रोज एक घंटा पेड़ों की देखभाल में अपना योगदान देकर प्रकृति से जुड़े हुए हैं। बाल सम्बल में अनेक प्रकार के बहुत सारे पौधों का रोपण किया जा चुका है। यहां अनार, पपीता, आम, अमरूद, जामुन, आंवला व नींबू के कई पेड़ हैं। साथ ही बिलपत्र, अर्जुन, बरगद, पीपल, नीम, खेजड़ी, बबूल, केला, संतरा, मौसमी, चीकू, कटहल, बलदावन, पैमलझाडी, इमली, गुलमोहर, सीताफल, फालसा, करुंजा, अंजीर आदि के भी पेड़ हैं। बाल सम्बल में पंचवटी के लगभग सभी वृक्ष हैं। परिसर में 250 गुलाब के पौधे भी लगाए गए हैं।

कच्ची बस्तियों में भी अस्थायी स्कूल
‘बाल सम्बल’ की नींव संत नारायण दास जी महाराज, कर्मयोगी मोहन भाई, स्थानीय सांसद सचिन पायलट और विधायक रामचंद्र सराधना के हाथों वर्ष 2008 में रखी गयी थी। संस्था के संस्थापक पंचशील जैन का कहना है कि आमेर तहसील के सिरोही गांव को हमने संस्था के निर्माण के लिए चुना, इसके पीछे कई कारण रहे हैं। पहला तो यह रहा कि एक साथ इतनी ज्यादा जमीन यहीं मिल सकी। हमें बच्चों का सिर्फ रहने-खाने का इंतजाम नहीं करना था, बल्कि उन्हें एक ऐसा माहौल भी देना था, जो उनके सर्वांगीण विकास में सहायक हो। हम जानते है कि करोड़ों बच्चों को आगे बढऩे के लिए मदद भरे हाथों की जरूरत है। आवासीय स्कूल तक सभी बच्चों की पहुंच नहीं हो सकती, अभावग्रस्त माता-पिता भी बच्चे को आंखों से दूर नहीं करना चाहते। ऐसे में जयपुर शहर की कच्ची बस्तियों के बच्चों के लिए भी संस्था की ओर से अस्थायी स्कूल चलाया जा रहा है। संबंधित अधिकारियों की इजाजत से जवाहर सर्किल उद्यान में बच्चों के लिए अनौपचारिक पाठशाला चलाई जा रही है। दो अध्यापक नियमित रूप से वहां दो घंटे पढ़ा रहे हैं। बच्चों को कॉपी, पेंसिल, किताबें सब संस्था की ओर से ही दी जाती हैं। इन बच्चों को पाठशाला तक लाने की जिम्मेदारी भी संस्था ने अपने जिम्मे रखी है। एक वेन की व्यवस्था की गई है, जो बच्चों को कच्ची बस्तियों से लेकर आती है, फिर छोडऩे जाती है। हमारी कोशिश एक नन्ही बूंद-सी कोशिश है, पर सबकी ऐसी बूंद-बूंद कोशिश से ही सूरत बदल सकती है, नन्हें बच्चों की तक़दीर संवर सकती है।