Category: Jan-Manch

कविता : सच्चे रिश्ते धीरे-धीरे सिमट रहे हैं…

– मनीष पाण्डेय “मनु” (लक्जमबर्ग) – रोज मर्रा के काम काज निपटाते-निपटाते जिन्दगी के हंसी लम्हे निपट रहे हैं सुविधाओं से लिपटने की होड़ में अकेलापन और अवसाद लिपट रहे…

कविता : ज़िन्दगी, बहुत ख़ास है तू ! कभी भारी, तो कभी हल्का, कोई लिबास है तू !!

– प्रियंका सिंह (रोटरडम द नीदरलैंड्स) – ज़िन्दगी, बहुत ख़ास है तू ! कभी भारी, तो कभी हल्का, कोई लिबास है तू !! तेरा अंदाज़-ए-बयां भी कुछ निराला सा !…

कविता : शह देने वाले को पहचान पाओगे तभी तो तुम ‘अर्जुन’ कहलाओगे

-विश्वास दुबे (द हेग, नीदरलैंड्स) – माथे पर तिलक लगा के भव्य सा कवच सजा के स्वर्ण कुंडल चमका के निज ओज को दमका के रणचंडी को करते ध्यान कर…

कविता : मैंने देखी है इक हकीकत… खुद को उड़ते हुए देखा है मैंने

– सुनीता पाहूजा (मारीशस) – मैंने देखी है इक हकीकत खुद को उड़ते हुए देखा है मैंने परों के साथ नहीं, बिना परों के खुद को उड़ते हुए देखा है…