हेल्प फाउंडेशन के संस्थापक पथिकृत साहा का मानना है कि आप किसी का भला करो तो भलाई की भावना इसी तरह और फैलती है। साहा खुद डिलीवरी बॉय होकर भी रेलवे स्टेशन के बेघर बच्चों के भोजन और पढ़ाई का खर्च उठा रहे हैं। उन्होंने बताया कि मेरा जन्म पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले के अत्यंत साधारण परिवार में हुआ। मेरे दादा बांग्लादेश से यहां आए थे। पिताजी नक्सली एरिया में फेरी लगाकर होजियरी के कपड़े बेचते थे। इससे जो आय होती थी, उसमें हमारा गुजारा होता था। कई बार पिताजी की उधारी डूब जाती थी। इससे हमें तंगी में रहना पड़ता था। मैं बहुत पढऩा चाहता था, लेकिन हालात ऐसे थे कि 11वीं के बाद पढ़ नहीं पाया। मुझे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में पम्प ऑपरेटर की नौकरी मिल गई तो पांच हजार रुपए की आय होने लगी। 2014 की बात है, मैं दमदम केंटोनमेंट एरिया से ट्रेन में सवार हुआ। तभी पांच वर्ष का एक बच्चा मुझसे भीख मांगने लगा। जब ट्रेन रफ्तार पकडऩे लगी तो बच्चा गेट का पाइप पकड़कर लटक गया और बोला कि दादा दे दो न कुछ पैसे, भूख लगी है। मैंंने उसे अंदर खींच लिया कि कहीं दुर्घटना न हो जाए। उस घटना ने मुझे विचलित कर दिया था। मैं सोचने लगा कि ऐसे और भी बच्चे होंगे, इनके लिए कुछ करना चाहिए। मैंने स्टेशन का मुआयना किया तो देखा कि वहां 3 से 12 वर्ष तक के कई बच्चे मस्ती करते दिखे। कपड़े के नाम पर उनके शरीर पर चीथड़े थे। मैंने उनसे बात की तो पता चला किसी के पिता नहीं हैं तो किसी की मां। किसी बच्चे को उसके मां-बाप स्टेशन पर ही छोड़ गए थे। बच्चे बोले भीख नहीं मांगी तो घर पर पिटाई होगी। कुछ बच्चों के पिता भीख के पैसों से शराब पी जाते थे। मैंने उस दिन करीब 200 रुपए जमा किए और इन सभी को भरपेट खाना खिलाया। उस दिन मुझे वह सुकून मिला, जो इससे पहले कभी नहीं मिला था। इन बच्चों के लिए कुछ करने का जोश मेरे अंदर भरने लगा। मैंने अपने कुछ मित्रों से बात की तो वे सहर्ष मेरे साथ जुड़ गए। हमने वाट्सएप पर एक ग्रुप बनाया और इन बच्चों के लिए मदद मांगी। हमें कहीं से पुराने कपड़े तो कहीं से कुछ खाना मिलने लगा, लेकिन यह अपर्याप्त था। शुरू में मैंने दो बच्चों के परिजनों से बात की कि अब इनसे भीख न मंगवाएं, इनकी देखभाल का जिम्मा मैं लेता हूं। इसके बाद एक-एक कर 15-20 बच्चे मुझसे जुड़ गए। मैंने ‘हेल्प फाउंडेशन’ नामक संस्था शुरू की। फेसबुक अकाउंट बनाया और आसपास की कॉलोनियों से मदद मांगने लगा। मैंने सोचा भरपेट खाना और कुछ कपड़े ही काफी नहीं होंगे। इसलिए एक तय समय पर इन्हें प्लेटफॉर्म नंबर 2 के अंतिम सिरे पर पढ़ाने लगा। इन बच्चों के लिए यह नया अनुभव था। चूंकि इन्हें पढ़ाई का माहौल नहीं मिला था, इसलिए मन लगाकर नहीं पढ़ते थे। मुझे इन्हें खाने का लालच देना पड़ता था। ये जब बारहखड़ी-पहाड़े-एबीसीडी सीख चुके तो इन्हें लेकर स्कूल में भर्ती कराने पहुंचा। वहां कागजी कार्यवाही बाधा बनी। काफी मशक्कत के बाद एफिडेविट कराकर इनके जन्म आदि के कागज बनवाए और 2014 में इनका दाखिला कराया। सुबह नाश्ते में मैं बच्चों को बिस्कुट व रोल देने लगा। लंच स्कूल में मिल जाता था और रात का खाना इन्हें मैं खिलाता था। दान में मिले हुए कपड़े, जूते, बस्ते, स्टेशनरी के सहारे ये पढऩे लगे। कुछ बच्चे अच्छे पढ़ रहे थे तो कुछ सामान्य। इन्हें इतना तो समझ में आ गया था कि पढ़ाई करेंगे, स्कूल जाएंगे तो दोनों वक्त अच्छा भोजन मिलेगा, वरना फिर से भीख मांगनी पड़ेगी। दो वर्ष में 30 बच्चे मुझसे जुड़ चुके थे। ज्यादातर स्कूल जा रहे हैं। मेरी पत्नी व माता-पिता कभी इस काम में बाधा नहीं बने।
एक बार बच्चों ने मॉल जाने की जिद की तो हमें बाहर ही रोक दिया गया। मैं वहीं धरने पर बैठ गया और चिल्लाने लगा कि आप कौन होते हो इंसानों में भेदभाव करने वाले। जब मामला बढ़ा और कुछ लोग मेरे सपोर्ट में आए तो हमें मॉल में घुसने दिया गया। कोल्ड डिं्रक व पॉपकॉर्न खाते हुए बच्चों ने वहां खूब मजा किया। इस बीच में पंप ऑपरेटर की नौकरी छोड़कर जोमैटो में नौकरी करने लगा तो ज्यादा आय होने लगी। जोमैटो की पॉलिसी के मुताबिक यदि कोई व्यक्ति ऑर्डर कैंसल कर देता है तो भोजन का वह पैकेट डिलीवरी बॉय रख सकता है। इस नियम के तहत मुझे रोजाना भोजन के कुछ पैकेट मिलने लगे। मेरे कुछ मित्र भी एक-दो पैकेट दे दिया करते हैं। साथ ही दो बड़े होटलों से मैंने मदद मांगी, तो बचा हुआ भोजन हमें दे देते हैं। यह भोजन मैं इन बच्चों में बांट देता हूं। सेवा का मूल्य किस तरह समाज में बदलाव लाता है, इसका एक उदाहरण बताता हूं। एक बार एक बच्चे को एक भूखी महिला नजर आई तो उसने अपने भोजन का बड़ा हिस्सा उस महिला को दे दिया। उसे पता था कि ऐसा करने पर उसे डांट पड़ेगी पर उसने कहा कि वह मेरी डांट खा लेगा पर महिला को भूखा नहीं रहने देगा। मैंने सोचा कि मेरे पास तो जोमैटो की नौकरी है पर इसके पास तो कुछ भी नहीं है, फिर भी वह अपना भोजन दे रहा है। आप किसी का भला करो तो भलाई की भावना इसी तरह और फैलती है। यहां तक पहुंचने के लिए मैंने बहुत संघर्ष किया है। रोजाना कुछ लोग आ जाते और कहते थे कि बच्चों के नाम पर मैं मोटी कमाई कर रहा हूं। बच्चों के परिजन को मेरे खिलाफ भड़काते थे। महीनों तक मुझे बुरी तरह परेशान किया गया। जब उन्हें पता लगा कि मैं अपनी जेब से काफी पैसा इन बच्चों के लिए खर्च कर रहा हूं तो थक-हारकर वे चुप हो गए।
पश्चिम बंगाल में भुखमरी बहुत है। यहां 100 लोग मदद करने का सार्वजनिक रूप से कहते तो हैं, लेकिन दो-तीन लोग ही मदद करते हैं। वे भी मध्यमवर्गीय होते हैं। मैं इतना कहना चाहता हूं कि देश में भूखे लोग बहुत हैं, खाना फेंकने की बजाय किसी जरूरतमंद को दे दें।