पशु चराने के साथ पढ़ाई की, कड़ी मेहनत देखकर न सिर्फ फ्री कोचिंग मिली बल्कि वहां पढ़ाकर कमाई का मौका भी मिला। ऐसे हालातों में आईएएस बनी सी. वनमती की कहानी सबको प्रेरित करने वाली है। वनमती बताती हैं कि तमिलनाडु के सत्यमंगलम गांव में बहुत ही गरीब परिवार में मेरा जन्म हुआ। पांचवीं कक्षा तक मैँ गांव के ही सरकारी स्कूल में पढ़ी। मेरी मां सब्बूलक्ष्मी घरेलू महिला रहीं, घर चलाने के लिए वे कई काम करती थीं, उन्हीं में से एक पशु चराना भी था। मैं भी मां के साथ पशु चराने जाने लगी। कई बार मां अन्य काम में उलझी रहती थीं तो मुझे बड़ी बहन के साथ पशु लेकर जंगल जाना पड़ता था। जब बड़ी हुई तो पढ़ाई की किताबें लेकर मैं अकेली ही पशु चराने जाने लगी। यह सब मेरे लिए सामान्य बात थी, क्योंकि गांव में ऐसा ही होता है। मेरा मन पढ़ाई में खूब लगता था, इसलिए माता-पिता ने पांचवीं के बाद एक इंग्लिश मीडियम स्कूल में मेरा दाखिला करवा दिया। मेरे पिता चेन्नीयप्पर पेशे से ड्राइवर थे। दोनों मिलकर कड़ी मेहनत करते थे, तब जाकर मुश्किल से हमारा गुजारा हो पाता था। हमेशा घर में गरीबी रहती थी। ऐसे हालात में भी पिता चाहते थे मैं खूब पढूं। मैं जब 10वीं कक्षा में थी तब एक दिन जिला कलेक्टर अतिथि बनकर स्कूल में आए। उन्होंने हायर एजूकेशन के साथ-साथ यूपीएससी के बारे में बताया। बोले- जीवन में कुछ पाना है तो शिक्षा को महत्व दो। मंजिल पाने का एक ही साधन है- शिक्षा। उनकी स्पीच सुनकर, रुतबा देखकर मैं इतनी प्रभावित हुई कि खुद भी कलेक्टर बनने के सपने देखने लगी। इसी के साथ एक लोकप्रिय टीवी सीरियल में आईएएस लेडी अफसर के कारनामे देखकर मेरे मन में उसके जैसी बनने के सपने और मजबूत होने लगे। 12वीं कक्षा पास करने तक मैं पशु चराती रहीं, अपनी किताबें भी साथ ले जाती थी। मेरे लिए पढऩे का वही सबसे अच्छा समय होता था।
जब 12वीं पास कर ली तो रिश्तेदार मेरी शादी करने का दबाव बनाने लगे। गांव के ज्यादातर लोग निरक्षर ही थे। हमारे समाज में लड़की जैसे ही कुछ बड़ी होती है, उसकी शादी कर देते हैं। लेकिन मैं आगे पढऩा चाहती थी। पिता मेरे साथ खड़े हुए तो समाज और रिश्तेदारों की परवाह न करते हुए मैंने कॉलेज में दाखिला ले लिया। अम्मन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से ग्रेजुएशन के साथ मैं प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी भी करती रही। प्रतियोगी परीक्षा के लिए मैंने नोट्स बनाए, अखबार की कतरनें जमा कर अपनी फाइल तैयार की। मेरी मेहनत रंग लाई और मैंने बीएससी बहुत अच्छे अंकों से पास की। मैंने चेन्नई जाने का मन बना लिया था। वहां एक सहेली की मदद से शंकर आईएएस अकादमी में मेरा दाखिला हो गया। वहां यूपीएससी की तैयारी कराई जाती थी। मैंने वहां के संचालकों को अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में बताया तो उन्होंने मेरी फीस माफ कर दी। इसके बाद मैंने पढ़ाई में जी-जान लगाकर दिन-रात एक कर दिया।
मेरी एक वर्ष की कड़ी मेहनत देखकर अकादमी ने मुझे अपने यहां शिक्षक के रूप में रख लिया। अब मैं स्टूडेंट्स को पढ़ाने के साथ खुद भी पढ़ती थी, साथ ही मुझे मिलने वाले वेतन से मेरी व परिवार की कुछ मदद होने लगी। आईएएस बनने के लिए मुझे इससे अच्छा अवसर कहां मिलने वाला था? तीन वर्ष मैंने वहां नौकरी की और आईएएस के साथ बैंक की परीक्षा भी दी। मुझे सफलता मिली और इरोड के नम्बीअर इंडियन ओवरसीज बैंक में मुझे असिस्टेंट मैनेजर बना दिया गया। इन नौकरी में पैसे ज्यादा मिलने लगे, लेकिन मेरा मन तो आईएएस बनने को बेताब था। मैंने पहली बार आईएएस परीक्षा दी तो पर्सनालिटी टेस्ट में फेल हो गई। पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते दूसरी बार प्री-एग्जाम पास नहीं कर पाई। तीसरी बार परीक्षा दी तब भी नौकरी के साथ घर की जिम्मेदारियों ने जकड़ रखा था और मेन एग्जाम में फेल हो गई। हर बार कोई मामूली चूक या कुछ अंकों से पिछड़ जाती थी। लेकिन मैंने खुद को कमजोर नहीं होने दिया और पिछली गलतियों से सबक लेकर 2015 में चौथी बार आईएएस की परीक्षा दी तो पिताजी गंभीर बीमार हो गए। जब रिजल्ट आने वाला था तब पिता को लकवा हो गया, उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। यह मेरे लिए बहुत बड़े हादसे के समान था। वे चार महीने भर्ती रहे, मैंने उन्हें अस्पताल में बताया कि मैंने आईएएस परीक्षा पास कर ली है। ऑल इंडिया लेवल पर मेरी 152वीं रैंक आई है। वे खुशी से रो पड़े तो मेरे भी आंसू निकल गए। एक सपना जो पूरा हो रहा था। उन्हें अस्पताल में छोड़कर मैं इंटरव्यू देने गई थी। पिता ने मेरे लिए बहुत संघर्ष किया, जब मेरी बारी आई कि मैं उन्हें सुख के दिन दे सकूं, उसके पहले उनका देहांत हो गया। मैं गम में टूट चुकी थी तभी मेरा ट्रेनिंग शेड्यूल आ गया। उनका आशीर्वाद साथ था। मुझे मसूरी भेज दिया गया। ट्रेनिंग के बाद पहली पोस्टिंग डिप्टी कलेक्टर के रूप में नंदूरबार (महाराष्ट्र) में हुई। मुझे सब कुछ सपने जैसा लगता है। हमें सपने देखने चाहिए, लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए दृढ़ आत्मविश्वास भी विकसित करना चाहिए।